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भारत ने रचा इतिहास: लद्दाख में शुरू हुए देश के पहले भू-तापीय (Geothermal) कुएँ

उज्जैन टाइम्स ब्यूरो
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भारत ने रचा इतिहास: लद्दाख में शुरू हुए देश के पहले भू-तापीय (Geothermal) कुएँ

14,000 फीट की ऊँचाई पर स्थापित परियोजना से स्वच्छ ऊर्जा के नए युग की शुरुआत


उज्जैन टाइम्स | लेह/नई दिल्ली

भारत ने स्वच्छ एवं आत्मनिर्भर ऊर्जा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए लद्दाख की पुगा घाटी (Puga Valley) में देश के पहले और सबसे गहरे भू-तापीय (Geothermal) कुओं का सफलतापूर्वक संचालन शुरू कर दिया है। यह परियोजना भारत की पहली 1 मेगावाट भू-तापीय विद्युत परियोजना की आधारशिला मानी जा रही है। 


दोनों कुओं की गहराई 1,000 मीटर है और इन्हें समुद्र तल से 14,000 फीट से अधिक ऊँचाई पर ड्रिल किया गया है। इतनी ऊँचाई पर इस प्रकार की ड्रिलिंग भारत में पहली बार हुई है और यह विश्व की चुनिंदा उच्च-ऊँचाई वाली भू-तापीय परियोजनाओं में शामिल हो गई है। 


क्या है भू-तापीय ऊर्जा?


भू-तापीय ऊर्जा (Geothermal Energy) पृथ्वी के भीतर मौजूद प्राकृतिक गर्मी से प्राप्त की जाती है। यह ऊर्जा स्रोत 24 घंटे उपलब्ध, स्वच्छ, विश्वसनीय और कार्बन उत्सर्जन रहित माना जाता है। सौर और पवन ऊर्जा के विपरीत, यह मौसम पर निर्भर नहीं होती। 


पुगा घाटी क्यों है खास?


लद्दाख की पुगा घाटी को भारत का सबसे समृद्ध भू-तापीय क्षेत्र माना जाता है। यहाँ भूमिगत तापमान लगभग 135°C तक दर्ज किया गया है, जो बिजली उत्पादन के लिए पर्याप्त क्षमता प्रदान करता है। 


परियोजना से होंगे ये प्रमुख लाभ

  • भारत की पहली 1 मेगावाट पायलट भू-तापीय विद्युत परियोजना को ऊर्जा मिलेगी।

  • लद्दाख जैसे दुर्गम क्षेत्रों में वर्षभर स्वच्छ और विश्वसनीय बिजली उपलब्ध होगी।

  • डीज़ल आधारित बिजली उत्पादन पर निर्भरता कम होगी।

  • कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी और नेट-ज़ीरो लक्ष्य को गति मिलेगी।

  • भविष्य में बड़े पैमाने पर भू-तापीय ऊर्जा विकास का मार्ग प्रशस्त होगा।


इन्फोग्राफिक बॉक्स

📍 स्थान: पुगा घाटी, लद्दाख

⛰️ ऊँचाई: 14,000+ फीट

🛢️ कुओं की गहराई: 1,000 मीटर (प्रत्येक)

⚡ परियोजना: भारत की पहली 1 मेगावाट भू-तापीय विद्युत परियोजना

🌡️ भूमिगत तापमान: लगभग 135°C

🌱 लाभ: स्वच्छ, निरंतर एवं कार्बन-मुक्त ऊर्जा


लद्दाख की पुगा घाटी में स्थापित ये भू-तापीय कुएँ केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता, हरित विकास और सतत भविष्य की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम हैं। आने वाले वर्षों में यह परियोजना देश में भू-तापीय ऊर्जा के नए अध्याय की शुरुआत कर सकती है।


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