वैश्विक कच्चे तेल - ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

उज्जैन टाइम्स ब्यूरो
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वैश्विक कच्चे तेल का झटका - ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
कीमतों में आने वाले झटके, सप्लाई पर पड़ने वाले असर के हिसाब से सीधे अनुपात में नहीं होते। ईरानी क्रांति की वजह से उत्पादन में सिर्फ़ ~7% की रुकावट आई थी, लेकिन इससे कीमतों में ज़बरदस्त ~300% की बढ़ोतरी हो गई। वहीं दूसरी ओर, होर्मुज़ की नाकेबंदी (अब तक) से सप्लाई/निर्यात पर ज़्यादा बड़ा जोखिम (13% / 30%) दिखाई देता है, लेकिन कीमतों में सिर्फ़ ~50% की बढ़ोतरी हुई है।
➡️ बाज़ार, मौजूदा सप्लाई में आई कमी के मुकाबले डर, अनिश्चितता और भविष्य के जोखिमों पर ज़्यादा प्रतिक्रिया देते हैं।
उत्पादन के मुकाबले निर्यात ज़्यादा मायने रखता है।
होर्मुज़ की नाकेबंदी और ईरानी क्रांति जैसी घटनाओं से पता चलता है कि उत्पादन के मुकाबले निर्यात पर कहीं ज़्यादा असर पड़ता है।
➡️ तेल की कीमतें, कुल उत्पादन के आंकड़ों के मुकाबले वैश्विक व्यापार के प्रवाह में आने वाली रुकावटों के प्रति ज़्यादा संवेदनशील होती हैं।
आधुनिक संघर्षों का कीमतों पर असर कम होता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध से पता चलता है कि उत्पादन में अपेक्षाकृत कम रुकावट (3%) आई और कीमतों में मध्यम स्तर की ~45% बढ़ोतरी हुई।
➡️ इसकी संभावित वजहें ये हो सकती हैं:
रणनीतिक भंडार
विविध सप्लाई चेन
तेज़ वैश्विक प्रतिक्रिया तंत्र
खाड़ी क्षेत्र की घटनाएँ अब भी सबसे ज़्यादा संवेदनशील बनी हुई हैं।
खाड़ी युद्ध और होर्मुज़ से जुड़े तनावों की वजह से अब भी कीमतों में बहुत ज़्यादा उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है।
➡️ ऐसा इसलिए है, क्योंकि होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) वैश्विक तेल प्रवाह के लिए एक बेहद अहम और संकरा रास्ता (chokepoint) है।
⚖️ मुख्य निष्कर्ष
तेल बाज़ारों का संचालन, असल में होने वाली कमी के मुकाबले इन चीज़ों से ज़्यादा होता है:
भविष्य में सप्लाई में आने वाले जोखिम का अनुमान
भू-राजनीतिक अनिश्चितता/ प्रमुख पारगमन मार्गों पर नियंत्रण
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